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"महाकालेश्वर मंदिर के अनसुलझे रहस्य और इतिहास: शिवपुराण से लेकर आज तक की पूरी जानकारी"

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

श्री महाकालेश्वर मंदिर उज्जैन नगरी के अधिपति, काल के भी काल, भगवान श्री महाकालेश्वर का मंदिर न केवल करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, नक्षत्र विज्ञान और आध्यात्मिकता का एक अद्भुत संगम भी है। उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर  भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, यह हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और तांत्रिक केंद्रों में से एक माना जाता है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में श्री महाकालेश्वर का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। मध्य प्रदेश के उज्जैन (प्राचीन अवंतिका) में शिप्रा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिणमुखी है। तंत्र शास्त्र में दक्षिणमुखी स्वरूप का विशेष महत्व है, जिसे 'दक्षिणामूर्ति' कहा जाता है। महाकाल को 'पृथ्वी का अधिपति' और 'काल का नियामक' माना गया है।

धार्मिक आस्था और मान्यताएँ

  • महाकाल का अर्थ: 'काल' के दो अर्थ हैं—समय और मृत्यु। शिव समय से परे हैं और मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाले हैं, इसलिए वे 'महाकाल' हैं।
  • समय का केंद्र: प्राचीन भारतीय भूगोल के अनुसार, उज्जैन को पृथ्वी का केंद्र (नाभि) माना जाता था। शून्य रेखा (Prime Meridian) यहीं से गुजरती थी, इसलिए यहाँ के शिव 'महाकाल' अर्थात् 'समय के स्वामी' कहलाए।
  • मोक्षदायिनी अवंतिका: सप्तपुरियों में से एक उज्जैन को मोक्ष की नगरी माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ महाकाल के दर्शन मात्र से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।

1. धार्मिक एवं पौराणिक आधार (Scriptural Context)

महाकालेश्वर का उल्लेख कई प्राचीन ग्रंथों में मिलता है, जो इसकी प्राचीनता और महत्ता को प्रमाणित करते हैं:

शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता): शिव पुराण के अनुसार, उज्जैन (अवंतिका) में दूषण नामक असुर के अत्याचार से भक्तों की रक्षा के लिए भगवान शिव धरती फाड़कर प्रकट हुए थे। असुर का संहार करने के बाद, भक्तों के आग्रह पर वे वहीं 'महाकाल' के रूप में स्थापित हो गए। शिवपुराण में भगवान शिव के 'महाकाल' स्वरूप का वर्णन अत्यंत भव्य और कल्याणकारी बताया गया है। महाकाल का अर्थ है— 'काल का भी काल', यानी वह सत्ता जिस पर समय (मृत्यु) का भी कोई वश नहीं चलता।

शिवपुराण के कोटिरुद्र संहिता के १६वें अध्याय में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति और उनके महाकाल कहलाने की कथा विस्तार से दी गई है।

महाकाल ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति की कथा

शिवपुराण के अनुसार, प्राचीन काल में उज्जैन (अवंती नगरी) में 'वेदप्रिय' नामक एक ज्ञानी ब्राह्मण रहते थे, जो भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। उनके चार पुत्र थे। उसी समय 'दूषण' नामक एक शक्तिशाली असुर ने ब्रह्मा जी से वरदान पाकर तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था।

  • असुर का आक्रमण: दूषण ने उज्जैन के ब्राह्मणों पर हमला किया और उन्हें अपनी भक्ति छोड़ने को कहा। जब ब्राह्मणों ने मना किया, तो वह उन्हें मारने दौड़ा।
  • शिव का प्रकट होना: ब्राह्मण बालक भयभीत नहीं हुए और पार्थिव शिवलिंग बनाकर शिव की आराधना करते रहे। जैसे ही दूषण ने उन पर प्रहार करना चाहा, वहां की धरती फटी और भगवान शिव एक विकराल रूप में प्रकट हुए।
  • दूषण का वध: शिव जी ने हुंकार भरी और कहा, "मैं दुष्टों का काल 'महाकाल' हूँ।" उन्होंने अपनी एक ही हुंकार से दूषण और उसकी सेना को भस्म कर दिया।

'महाकाल' नाम का महत्व

  • शिवपुराण के अनुसार, शिव ही सृष्टि के अंत में 'काल' (समय) के रूप में सब कुछ निगल जाते हैं।
  • कालजयी: महाकाल वह हैं जो समय के चक्र से परे हैं। भक्त मानते हैं कि जो महाकाल की शरण में है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता।
  • मृत्यु पर विजय: "अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चंडाल का, काल उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल का।" यह भाव शिवपुराण के दर्शन से ही प्रेरित है।
  • स्कंद पुराण (अवन्ती खंड): इसमें उज्जैन के महात्म्य और महाकाल वन का विस्तार से वर्णन है। यहाँ शिव को 'काल के भी काल' (महाकाल) के रूप में पूजा जाता है।
  • मत्स्य पुराण और लिंग पुराण: इन ग्रंथों में भी इस ज्योतिर्लिंग की महिमा का गान किया गया है।
  • कालिदास कृत 'रघुवंशम्' और 'मेघदूतम्': महाकवि कालिदास ने महाकाल मंदिर के संध्याकालीन पूजन और यहाँ के वैभव का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है।
  • अद्वितीय विशेषता: दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंगमहाकालेश्वर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है।शास्त्रानुसार, दक्षिण दिशा "काल" (मृत्यु) की दिशा मानी जाती है। भगवान शिव यहाँ दक्षिण की ओर मुख करके विराजमान हैं, जिसका अर्थ है कि वे अपने भक्तों को अकाल मृत्यु और भय से मुक्ति प्रदान करते हैं। तंत्र शास्त्र में दक्षिणमुखी होना अत्यंत शक्तिशाली और फलदायी माना जाता है।

 2.मंदिर की वास्तुकला (Architecture)

वर्तमान मंदिर की संरचना मराठा, भूमिज और चालुक्य शैलियों का मिश्रण है। मंदिर मुख्य रूप से तीन स्तरों में विभाजित है:

  • गर्भगृह (निचला तल): यहाँ भगवान महाकालेश्वर (ज्योतिर्लिंग) स्थापित हैं।
  • मध्य तल: यहाँ 'ओंकारेश्वर' महादेव का लिंग स्थापित है।
  • ऊपरी तल: यहाँ 'नागचंद्रेश्वर' का मंदिर है, जो केवल वर्ष में एक बार नागपंचमी के दिन दर्शन के लिए खुलता है।

 3.भस्म आरती: एक अलौकिक परंपरा

महाकाल मंदिर की सबसे प्रसिद्ध विशेषता 'भस्म आरती' है। प्राचीन काल में इसे श्मशान की ताजी राख से किया जाता था, जो इस बात का प्रतीक है कि जीवन नश्वर है और अंत में सब कुछ भस्म (राख) में मिल जाना है। वर्तमान में, यह आरती कपिला गाय के गोबर के कंडे, शमी, पीपल और अन्य पवित्र लकड़ियों की राख से की जाती है। यह आरती सूर्योदय से पूर्व होती है और इसमें भगवान का दिव्य श्रृंगार किया जाता है।

 4.ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

यद्यपि मंदिर अनादि काल से है, लेकिन इतिहास में इसके पुनर्निर्माण के कई प्रमाण मिलते हैं:

1234-35 ईस्वी: दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने मंदिर पर आक्रमण कर इसे नष्ट कर दिया था।

मराठा काल (18वीं शताब्दी): वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण मराठा सेनापति राणेजी शिंदे ने करवाया था। हाल ही में भारत सरकार द्वारा 'महाकाल लोक' कॉरिडोर का निर्माण किया गया है, जिसने इसे और भी भव्य बना दिया है।

 5.आध्यात्मिक महत्व

उज्जैन को 'नाभि देश' माना जाता है (पृथ्वी का केंद्र)। खगोलीय दृष्टि से भी उज्जैन कर्क रेखा (Tropic of Cancer) पर स्थित है, जिसके कारण इसे समय की गणना का केंद्र माना गया। इसी कारण यहाँ के अधिपति 'महाकाल' (Time/Eternity के देवता) कहलाते हैं।

"आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम्। मृत्युलोके च महाकालं लिंगत्रयं नमोस्तुते।।" (अर्थात्: आकाश में तारकलिंग, पाताल में हाटकेश्वर और पृथ्वी पर महाकाल—इन तीन प्रधान लिंगों को मैं नमन करता हूँ।)

6.श्री महाकाल लोक कॉरिडोर (विशेषताएँ)

  • अक्टूबर 2022 में प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटित यह कॉरिडोर न केवल उज्जैन बल्कि भारत के सबसे बड़े धार्मिक गलियारों में से एक है।
  • विशालता: यह लगभग 900 मीटर से अधिक लंबा है। यह वाराणसी के काशी विश्वनाथ कॉरिडोर से भी लगभग चार गुना बड़ा है।
  • शिव पुराण की कथाएँ: कॉरिडोर की दीवारों पर शिव पुराण की कहानियों को भित्ति चित्रों (Murals) और सुंदर नक्काशी के माध्यम से दर्शाया गया है। इसमें त्रिपुरासुर वध, दक्ष यज्ञ, सती दहन और शिव-पार्वती विवाह जैसे प्रसंग जीवंत हो उठते हैं।
  • मूर्तियाँ और स्तंभ: यहाँ भगवान शिव, गणेश और कार्तिकेय की 190 से अधिक भव्य मूर्तियाँ स्थापित हैं। इसके अलावा, यहाँ 108 स्तंभ (Pillars) हैं जो शिव के आनंद तांडव स्वरूप को दर्शाते हैं।
  • कमल सरोवर: कॉरिडोर के बीच में एक सुंदर सरोवर है जिसमें कमल के फूल और फव्वारे लगे हैं, जो रात के समय रोशनी में अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करते हैं।
  • सुविधाएँ: श्रद्धालुओं के लिए यहाँ 'त्रिवेणी संग्रहालय', ओपन-एयर थिएटर और विशाल पार्किंग की व्यवस्था है।

7.महाकाल की प्रमुख पूजा विधियाँ (Rituals)

  • महाकाल में होने वाली पूजा-आरती का अपना एक व्यवस्थित विधान है, जो सदियों से चला आ रहा है:
  • भस्म आरती (भोर): यह सबसे महत्वपूर्ण आरती है जो प्रतिदिन सुबह 4:00 बजे होती है।
  • नियम: इसमें पुरुषों को धोती (सोला) और महिलाओं को साड़ी पहनना अनिवार्य है।
  • प्रक्रिया: भगवान को भस्म (राख) अर्पित की जाती है, जो वैराग्य और सृष्टि के चक्र का प्रतीक है।
  • जलाभिषेक और पंचामृत अभिषेक: भक्त गर्भगृह में जाकर ज्योतिर्लिंग पर जल, दूध, दही, शहद और घी अर्पित करते हैं। विशेष पर्वों पर 'महापूजा' भी की जाती है।
  • भोग आरती (दोपहर): दोपहर में भगवान को नैवेद्य (भोजन) अर्पित किया जाता है और आरती की जाती है।
  • संध्या आरती (शाम): शाम को भगवान का दिव्य श्रृंगार किया जाता है। इसमें भांग, सूखे मेवे और चंदन का उपयोग कर शिव का अद्भुत रूप बनाया जाता है।
  • शयन आरती (रात्रि): रात में मंदिर बंद होने से पहले भगवान की अंतिम आरती होती है, जिसके बाद उन्हें विश्राम कराया जाता है।

 8.विशेष पर्व और परंपराएँ

  • शाही सवारी: सावन और भादौ मास के प्रत्येक सोमवार को बाबा महाकाल नगर भ्रमण पर निकलते हैं। इसे 'शाही सवारी' कहा जाता है, जहाँ राजा के रूप में महाकाल अपनी प्रजा का हाल जानने निकलते हैं।
  • शिव नवरात्रि: महाशिवरात्रि से 9 दिन पहले यहाँ उत्सव शुरू होता है, जिसमें प्रतिदिन शिव का अलग-अलग रूप में श्रृंगार (जैसे दूल्हा स्वरूप) किया जाता है।

9.महाकाल मंदिर पहुँचने के माध्यम

  • हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा देवी अहिल्या बाई होल्कर एयरपोर्ट (इन्दौर) है, जो उज्जैन से लगभग 55 किमी दूर है।
  • रेल मार्ग: उज्जैन जंक्शन (UJN) देश के सभी प्रमुख शहरों से सीधे जुड़ा हुआ है।
  • सड़क मार्ग: इन्दौर, भोपाल और ग्वालियर से नियमित बसें और निजी टैक्सियाँ उपलब्ध हैं।

 10.यात्रा से जुड़ी उपयोगी जानकारी

  • सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च के बीच मौसम अनुकूल रहता है।
  • प्रमुख त्योहार: महाशिवरात्रि (यहाँ शिव नवरात्रि मनाई जाती है), सावन का महीना और सावन के सोमवार को निकलने वाली 'महाकाल की सवारी' देखने लायक होती है।
  • सावधानियाँ: मोबाइल और कैमरा मंदिर के भीतर प्रतिबंधित हैं। आधिकारिक वेबसाइट (mahakaleshwar.nic.in) से ही बुकिंग करें।

 निष्कर्ष

श्री महाकालेश्वर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि अनंत काल और मानवता के अस्तित्व का प्रतिबिंब है। यहाँ की भस्म आरती वैराग्य सिखाती है, तो 'महाकाल लोक' की भव्यता शिव के ऐश्वर्य का दर्शन कराती है। यह स्थान हमें संदेश देता है कि परिवर्तन ही शाश्वत सत्य है और शिव ही अंत और प्रारंभ के स्वामी हैं।

महत्वपूर्ण FAQs (सामान्य प्रश्नोत्तर)

प्रश्न 1: क्या भस्म आरती देखना निःशुल्क है? 

उत्तर: भस्म आरती के दर्शन के लिए बुकिंग शुल्क निर्धारित है। ऑनलाइन बुकिंग के माध्यम से आप अपनी जगह सुरक्षित कर सकते हैं।

प्रश्न 2: क्या दर्शन के लिए कोई ड्रेस कोड है? 

उत्तर: सामान्य दर्शन के लिए कोई कड़ा ड्रेस कोड नहीं है, लेकिन गर्भगृह में अभिषेक या भस्म आरती के लिए पुरुषों को धोती-सोला और महिलाओं को साड़ी पहनना अनिवार्य है।

प्रश्न 3: मंदिर में वीआईपी (VIP) दर्शन की क्या प्रक्रिया है?

 उत्तर: मंदिर प्रशासन द्वारा 'शीघ्र दर्शन' काउंटर से सशुल्क रसीद कटाकर कम समय में दर्शन किए जा सकते हैं।

प्रश्न 4: उज्जैन में महाकाल के अलावा और कौन से प्रमुख स्थान हैं? 

उत्तर: हरसिद्धि माता मंदिर (शक्तिपीठ), काल भैरव मंदिर, मंगलनाथ मंदिर और सांदीपनि आश्रम प्रमुख स्थल हैं।

प्रश्न 5: काल भैरव मंदिर में शराब चढ़ाने की परंपरा क्या है? 

उत्तर: यह एक प्राचीन तांत्रिक परंपरा है जहाँ भगवान को मदिरा का भोग लगाया जाता है, जो लोक मान्यताओं पर आधारित है।

प्रश्न 6: क्या बुजुर्गों के लिए व्हीलचेयर उपलब्ध है?

 उत्तर: हाँ, मंदिर प्रशासन द्वारा बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए व्हीलचेयर और अलग कतार की व्यवस्था की जाती है।

प्रश्न 7: क्या वर्तमान समय में गर्भगृह में प्रवेश और पूजा की अनुमति है ? 

उत्तर: जी हाँ, श्री महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह (Garbhgrih) में प्रवेश और पूजा की अनुमति है, लेकिन इसके लिए मंदिर प्रशासन (Shree Mahakaleshwar Temple Management Committee) ने कुछ कड़े नियम और समय निर्धारित किए हैं।

प्रश्न 8: क्या दर्शन करने के लिए  कुछ नियम बनाए गए हैं?

उत्तर: चूँकि 'महाकाल लोक' बनने के बाद से भक्तों की संख्या बहुत बढ़ गई है, इसलिए व्यवस्थाओं में अक्सर बदलाव होते रहते हैं। वर्तमान स्थिति के अनुसार मुख्य जानकारी नीचे दी गई है:

  •  गर्भगृह प्रवेश के लिए ड्रेस कोड (अनिवार्य)
  • अगर आप गर्भगृह के भीतर जाकर जल अर्पित करना चाहते हैं या पूजा करना चाहते हैं, तो साधारण कपड़ों में प्रवेश नहीं मिलता:
  • पुरुषों के लिए: धोती और सोला (बिना सिला हुआ रेशमी या सूती वस्त्र)।
  • महिलाओं के लिए: केवल साड़ी (सूट या जींस पहनकर गर्भगृह में प्रवेश वर्जित है)।
  • सामान्यतः, गर्भगृह में जाकर दर्शन या अभिषेक करने के लिए 1500 रुपये (अभिषेक रसीद) या समय-समय पर प्रशासन द्वारा तय की गई राशि की रसीद कटवानी होती है। इसमें दो व्यक्तियों को प्रवेश मिलता है।
  • भीड़ के समय: यदि मंदिर में बहुत अधिक भीड़ होती है (जैसे शनिवार, रविवार या सोमवार को), तो गर्भगृह में प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया जाता है। उस समय सभी भक्तों को 'नंदी हॉल' के पीछे या 'बैरिकेट्स' से ही दर्शन करने होते हैं।
  • निशुल्क प्रवेश: कभी-कभी सामान्य दिनों में दोपहर के समय (लगभग 12:00 से 1:00 के बीच) बिना रसीद के भी गर्भगृह में प्रवेश खोला जाता है, लेकिन यह पूरी तरह उस दिन की भीड़ और प्रशासन के निर्णय पर निर्भर करता है।

 प्रतिबंधित समय (इन दिनों एंट्री नहीं मिलती)

  • सावन और भाद्रपद मास: इन महीनों में भीड़ बहुत ज्यादा होने के कारण गर्भगृह में प्रवेश अक्सर हफ्तों तक बंद रहता है।
  • प्रमुख त्योहार: महाशिवरात्रि, दीपावली और होली जैसे बड़े पर्वों पर सुरक्षा कारणों से गर्भगृह प्रवेश बंद रहता है।
  • भस्म आरती: भस्म आरती के दौरान केवल वही लोग गर्भगृह जा सकते हैं जिनकी अभिषेक की विशेष अनुमति हो, बाकी लोग नंदी हॉल या दीर्घा से दर्शन करते हैं।

 महत्वपूर्ण सुझाव:

ऑनलाइन बुकिंग: यदि आप गर्भगृह में जाना चाहते हैं, तो मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर 'Garbhgriha Darshan' या 'Abhishek' की उपलब्धता पहले ही चेक कर लें।

समय का ध्यान: सुबह की आरती के बाद और दोपहर की आरती से पहले का समय गर्भगृह प्रवेश के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।

एक रोचक तथ्य: उज्जैन को 'स्वर्ण श्रृंग' भी कहा जाता था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहाँ के महाकाल मंदिर का शिखर कभी शुद्ध सोने का हुआ करता था, जिसे बाद के काल में बाहरी आक्रमणकारियों द्वारा लूटा गया।


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