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श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग: पौराणिक उत्पत्ति की कथा और मंदिर का गौरवशाली इतिहास

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग

भारत की अस्मिता का सूर्य और प्रथम ज्योतिर्लिंग


"समय की रेत पर अंकित एक ऐसी गाथा, जिसे न तो समुद्र की लहरें मिटा सकीं और न ही आक्रमणकारियों की तलवारें।"

भूमिका (Introduction)

अरब सागर की लहरों के किनारे, गुजरात के वेरावल में स्थित 'सोमनाथ मंदिर' केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान का जीवंत दस्तावेज है। इसे 'अमरता का मंदिर' कहा जाता है, क्योंकि इतिहास के तमाम आक्रमणों के बाद भी यह हर बार अपने भस्म से पुनर्जीवित होकर खड़ा हुआ है।

ज्योतिर्लिंग की अवधारणा

हिंदू धर्म में 'ज्योतिर्लिंग' उस प्रकाश पुंज को कहा जाता है जहाँ स्वयं भगवान शिव प्रकट हुए थे। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में सोमनाथ का स्थान प्रथम है:
"सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥
एतानि ज्योतिलिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥

पौराणिक उत्पत्ति (Mythological Origin)

सृष्टि के प्रारंभ में, ब्रह्मा के मानस पुत्र प्रजापति दक्ष ने अपनी 27 पुत्रियों (जिन्हें हम 27 नक्षत्रों के रूप में जानते हैं) का विवाह चंद्रदेव (सोम) के साथ किया। इन पुत्रियों में अश्विनी, भरणी और रोहिणी आदि प्रमुख थीं।

पक्षपात और बहनों की व्यथा: विवाह के पश्चात चंद्रदेव अपनी सभी पत्नियों में से केवल रोहिणी के प्रति अत्यधिक आसक्त थे। वे अपना सारा समय रोहिणी के साथ बिताते और अन्य 26 पत्नियों की उपेक्षा करते थे। जब अन्य बहनों ने अपना दुख पिता दक्ष को सुनाया, तो दक्ष ने चंद्रमा को कई बार समझाया कि एक पति के रूप में उन्हें समभाव रखना चाहिए।

दक्ष का क्रोध और 'क्षय रोग' का श्राप: चंद्रमा ने दक्ष की चेतावनियों को अनसुना कर दिया। अंततः, अपनी पुत्रियों के अपमान से क्रोधित होकर दक्ष ने चंद्रमा को श्राप दिया— "जिस चमक और सौंदर्य पर तुम्हें इतना अभिमान है, वह तत्काल नष्ट हो जाए और तुम 'क्षय रोग' (Consumption/Waning) से ग्रस्त हो जाओ।"
इस श्राप के कारण चंद्रमा की कलाएं क्षीण होने लगीं, उनकी आभा लुप्त हो गई और वे मृत्यु के निकट पहुँच गए। चंद्रमा के तेज के बिना वनस्पतियां सूखने लगीं और पूरे ब्रह्मांड में असंतुलन पैदा हो गया।

प्रभास क्षेत्र में महामृत्युंजय तपस्या: अपनी रक्षा हेतु चंद्रदेव ब्रह्मा जी की शरण में गए। ब्रह्मा जी ने उन्हें परामर्श दिया कि वे 'प्रभास क्षेत्र' (सरस्वती नदी के समुद्र संगम स्थल) पर जाकर भगवान शिव की पार्थिव पूजा और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।
तपस्या की अवधि: चंद्रमा ने 6 महीने तक निराहार रहकर घोर तपस्या की।
मंत्र: उन्होंने भगवान शिव के मृत्युंजय स्वरूप की आराधना की।

शिव का प्राकट्य और 'वरदान': चंद्रमा की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान आशुतोष प्रकट हुए। चूँकि दक्ष का श्राप पूर्णतः निष्फल नहीं किया जा सकता था, इसलिए शिव ने चंद्रमा के कष्ट का निवारण करते हुए उसे दो पक्षों (कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष) में विभाजित कर दिया।
वरदान: शिव ने कहा कि "एक पक्ष में तुम्हारी कलाएं घटेंगी (दक्ष का मान), किंतु दूसरे पक्ष में मेरी कृपा से तुम्हारी कलाएं पुनः बढ़ेंगी (शिव का वरदान)।"
मस्तक पर वास: शिव ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया, जिससे चंद्रमा पुनः 'सशक्त' और 'आभामय' हो गए।

"'सोमनाथ' नाम की उत्पत्ति:
देवताओं और चंद्रमा की प्रार्थना पर भगवान शिव वहां ज्योति के रूप में सदा के लिए स्थापित हो गए। चूँकि भगवान शिव यहाँ 'सोम' (चंद्रमा) के 'नाथ' (स्वामी और रक्षक) बनकर प्रकट हुए, इसलिए इस ज्योतिर्लिंग का नाम 'सोमनाथ' पड़ा। जिस स्थान पर चंद्रमा ने अपनी खोई हुई आभा (Prabhas) पुनः प्राप्त की, वह क्षेत्र 'प्रभास पाटन' कहलाया।
चंद्रदेव की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें यहाँ अमरता प्रदान की और उनके 'नाथ' (स्वामी) कहलाए।"

ऐतिहासिक कालक्रम (History)

कालखंड महत्वपूर्ण घटना
प्राचीन काल सोने(चंद्रमा),चांदी(रावण) और चंदन की लकड़ी (भगवान श्री कृष्ण) के मंदिरों का उल्लेख।
1024 ईस्वी महमूद गजनवी द्वारा मंदिर का विध्वंस।
1706 ईस्वी औरंगजेब द्वारा मंदिर को क्षति पहुँचाने का प्रयास।
1947 ईस्वी 13 नवंबर 1947 को सोमनाथ मंदिर के खंडहरों का दौरा किया था।
1951ईस्वी 11 मई 1951 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मौजूदा मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न की थी।

मंदिर की वास्तुकला (Architecture)

वर्तमान मंदिर 'कैलाश महामेरु प्रसाद' (चालुक्य) शैली में बना है।

बाण स्तंभ (Arrow Pillar)

मंदिर के प्रांगण में स्थित यह स्तंभ प्राचीन भूगोल विज्ञान का प्रमाण है, जो बताता है कि यहाँ से दक्षिण ध्रुव के बीच कोई भूमि नहीं है।

यात्रा एवं दर्शन मार्गदर्शिका

  • कैसे पहुँचें: निकटतम रेलवे स्टेशन वेरावल (5 किमी) है।
  • दर्शन समय: सुबह 6:00 से रात 9:00 बजे तक।
  • आरती समय: सुबह 7:00, दोपहर 12:00 और शाम 7:00 बजे।
  • लाइट शो: शाम 8:00 बजे (हिंदी में)।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न: क्या मंदिर में मोबाइल ले जा सकते हैं? उत्तर: नहीं, मंदिर के अंदर मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स प्रतिबंधित हैं। बाहर लॉकर उपलब्ध हैं।
प्रश्न: सोमनाथ से द्वारका कैसे जाएँ? उत्तर: आप बस या टैक्सी से जा सकते हैं (दूरी 230 किमी, समय 5 घंटे)।
प्रश्न: रहने के लिए सबसे अच्छी जगह? उत्तर: सोमनाथ ट्रस्ट के 'सागर दर्शन' गेस्ट हाउस सबसे उत्तम हैं।
सोमनाथ मंदिर य गुजरात राज्य सरकार की वैधानिक वेव साइट से ही ON LINE TICKET या अन्य जानकारी प्राप्त करें।
https://somnath.org/somnath-darshan/

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